बच्चेदानी में पानी की गांठ

बच्चेदानी में पानी की गांठ एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है जो महिलाओं में आम तौर पर देखी जाती है। यह द्रव से भरी हुई थैली होती है जो गर्भाशय या अंडाशय में विकसित हो सकती है। चिकित्सा भाषा में इसे सिस्ट या रसौली के नाम से जाना जाता है। बच्चेदानी में गांठ की समस्या प्रजनन आयु की महिलाओं में अधिक देखने को मिलती है, हालांकि यह किसी भी उम्र में हो सकती है। अधिकांश मामलों में ये गांठें सौम्य (बिनाइन) होती हैं और कैंसरयुक्त नहीं होतीं। बच्चेदानी में गांठ होना एक सामान्य स्थिति है – लगभग हर पांच में से एक महिला को अपने जीवनकाल में यह समस्या हो सकती है। कई बार छोटी गांठें बिना किसी लक्षण के अपने आप ठीक हो जाती हैं लेकिन बड़ी गांठों में दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव और अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। इस ब्लॉग में हम रसौली का घरेलू इलाज, पानी वाली रसौली के लक्षण और बच्चेदानी में पानी की गांठ के इलाज के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे, साथ ही यह भी जानेंगे कि रसौली क्यों होती है। 

बच्चेदानी में पानी की गांठ क्या होती है?

“बच्चेदानी में पानी की गांठ” का मतलब है ऐसी गांठ या थैली जिसमें तरल पदार्थ जमा हो जाता है। यह कई रूपों में दिखाई दे सकती है:

  • ओवरी से जुड़ी सिस्ट
  • यूटरस की दीवार में बनने वाली सिस्टिक संरचना
  • एंडोमेट्रियल सिस्ट
  • ट्यूब में जमा द्रव (Hydrosalpinx)

इसे कई बार आम भाषा में “पानी वाली रसौली” कहा जाता है, जिससे महिलाओं में भ्रम पैदा होता है। ध्यान रहे, हर रसौली कैंसर नहीं होती और अधिकतर मामलों में ये गांठें नियंत्रण योग्य होती हैं।

बच्चेदानी में पानी की गांठ के प्रकार

बच्चेदानी और आसपास के क्षेत्र में विकसित होने वाली पानी की गांठें कई प्रकार की हो सकती हैं:

 

  • अंडाशय की सिस्ट (ओवेरियन सिस्ट): अंडाशय में बनने वाली द्रव से भरी थैली को ओवेरियन सिस्ट कहते हैं। ये मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं – फॉलिकल सिस्ट और कॉर्पस ल्यूटियम सिस्ट। फॉलिकल सिस्ट तब बनती है जब अंडाशय से अंडा निकलने वाली थैली ठीक से नहीं फटती और द्रव जमा होने लगता है। कॉर्पस ल्यूटियम सिस्ट तब विकसित होती है जब अंडा निकलने के बाद थैली का मुंह बंद हो जाता है और उसमें द्रव इकट्ठा हो जाता है।
  • नेबोथियन सिस्ट (सर्वाइकल सिस्ट): यह गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) पर बनने वाली छोटी म्यूकस से भरी गांठें होती हैं। ये आमतौर पर चावल के दाने या मटर के आकार की होती हैं और पीले या सफेद रंग की दिखाई देती हैं। प्रसव के बाद नई कोशिकाओं का विकास होने पर ग्रंथियां बंद हो सकती हैं, जिससे नेबोथियन सिस्ट बन सकती है।
  • सिस्टाडेनोमा: यह अंडाशय की सतह पर बनने वाली सिस्ट है जो पानी जैसे द्रव या म्यूकस से भरी होती है। ये अन्य प्रकार की सिस्ट से बड़ी हो सकती हैं।​
  • एंडोमेट्रियोमा (चॉकलेट सिस्ट): जब गर्भाशय की परत के समान ऊतक अंडाशय में विकसित होते हैं, तो गहरे भूरे रंग के द्रव से भरी सिस्ट बन जाती है, जिसे चॉकलेट सिस्ट कहा जाता है। 

 

रसौली होने के मुख्य कारण

बच्चेदानी में गांठ बनने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:

 

  • हार्मोनल असंतुलन: एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के स्तर में असंतुलन सिस्ट और फाइब्रॉइड दोनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर अधिक होता है, तो गांठों के बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। गर्भावस्था के दौरान ये गांठें बड़ी हो सकती हैं, जबकि रजोनिवृत्ति के बाद आमतौर पर सिकुड़ जाती हैं। 
  • ओव्यूलेशन की प्रक्रिया: सामान्य मासिक चक्र के दौरान अंडाशय में फॉलिकल विकसित होते हैं। यदि फॉलिकल ठीक से नहीं फटता या अंडा निकलने के बाद थैली सिकुड़ती नहीं है, तो कार्यात्मक सिस्ट बन सकती है। ये आमतौर पर हानिरहित होती हैं और कुछ महीनों में अपने आप ठीक हो जाती हैं। 
  • आनुवंशिक कारण: यदि परिवार में किसी महिला को पहले से गांठ की समस्या रही है, तो अगली पीढ़ी में इसकी संभावना बढ़ जाती है।​
  • मोटापा और शारीरिक वजन: अधिक वजन वाली महिलाओं में गांठ होने का खतरा अधिक होता है। वसा कोशिकाएं एस्ट्रोजन उत्पन्न करती हैं, इसलिए अधिक वजन वाली महिलाओं के शरीर में हार्मोन का स्तर अधिक होता है।​
  • उम्र: 30 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं में गांठ होने की संभावना सबसे अधिक होती है। युवावस्था से पहले ये नहीं बनती हैं और रजोनिवृत्ति के बाद इनकी संख्या कम हो जाती है।
  • अन्य कारण: प्रारंभिक मासिक धर्म (10 वर्ष की आयु से पहले), श्रोणि संक्रमण (पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज), एंडोमेट्रियोसिस, उच्च रक्तचाप, विटामिन डी की कमी, तनावपूर्ण जीवनशैली, धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन भी गांठ बनने के कारण हो सकते हैं।​

 

पानी वाली रसौली के लक्षण

अधिकांश मामलों में बच्चेदानी में पानी की गांठ कोई लक्षण नहीं दिखाती है और रूटीन जांच के दौरान ही पता चलती है। हालांकि, जब गांठ बड़ी हो जाती है या जटिलताएं पैदा करती है, तो निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं:

 

  • पेट के निचले हिस्से में दर्द: यह दर्द हल्का या तीव्र हो सकता है जो पेट के निचले भाग या श्रोणि क्षेत्र में महसूस होता है। दर्द एक तरफ अधिक हो सकता है और आता-जाता रह सकता है। मासिक धर्म के दौरान या बाद में यह दर्द बढ़ सकता है।
  • अनियमित और भारी मासिक धर्म: मासिक धर्म में असामान्य बदलाव गांठ का सबसे सामान्य लक्षण है। बहुत अधिक रक्तस्राव होना, थक्के निकलना, सामान्य से अधिक दिनों तक पीरियड्स चलना, या पीरियड्स के बीच में स्पॉटिंग होना शामिल है। इससे कमजोरी और एनीमिया की समस्या हो सकती है।​
  • पेट में भारीपन और सूजन: गांठ बड़ी होने पर पेट फूला हुआ महसूस होता है या पेट में भारीपन की अनुभूति होती है। पेट का आकार बढ़ सकता है और कपड़े टाइट लगने लगते हैं।
  • बार-बार पेशाब आना या कब्ज: जब गांठ मूत्राशय या आंतों पर दबाव डालती है तो बार-बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती है। कुछ मामलों में पेशाब करने में दर्द या कब्ज की समस्या भी हो सकती है। 
  • संभोग के दौरान दर्द: बड़ी गांठें यौन संबंध बनाते समय दर्द या असुविधा पैदा कर सकती हैं। कभी-कभी संभोग के बाद रक्तस्राव भी हो सकता है। 

 

बच्चेदानी में पानी की गांठ का निदान

 

  • पेल्विक परीक्षण

 

डॉक्टर आंतरिक और बाह्य श्रोणि परीक्षण करके गांठ को महसूस कर सकते हैं। अक्सर नियमित जांच के दौरान ही गांठ का पता चलता है। 

 

  • अल्ट्रासाउंड

 

ट्रांसवेजाइनल या ट्रांसएब्डोमिनल अल्ट्रासाउंड सबसे आम निदान विधि है। यह गांठ की स्थिति, आकार और प्रकार (द्रव से भरी, ठोस या मिश्रित) को दर्शाता है।

 

  • एमआरआई (MRI)

 

यह परीक्षण गांठ के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी प्रदान करता है और विभिन्न प्रकार की गांठों की पहचान में मदद करता है।​

 

  • रक्त परीक्षण

 

हार्मोन स्तर की जांच और गर्भावस्था परीक्षण किया जा सकता है। कुछ मामलों में कैंसर मार्कर की जांच भी की जाती है। 

 

  • कोल्पोस्कोपी

 

सर्वाइकल गांठों की अधिक बारीकी से जांच के लिए कोल्पोस्कोपी की जा सकती है।

बच्चेदानी में पानी की गांठ का इलाज

 

  • प्रतीक्षा और निगरानी: छोटी, लक्षणहीन गांठें अक्सर अपने आप ठीक हो जाती हैं। डॉक्टर कुछ हफ्तों या महीनों बाद फॉलो-अप अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं। अधिकांश कार्यात्मक सिस्ट 60 दिनों के भीतर बिना उपचार के गायब हो जाती हैं।​
  • दवा उपचार: हार्मोनल दवाएं, जैसे गर्भनिरोधक गोलियां भविष्य में नई गांठें बनने से रोकने में मदद कर सकती हैं, हालांकि ये मौजूदा गांठों को नहीं हटातीं। दर्द निवारक दवाएं (जैसे इबुप्रोफेन) लक्षणों को प्रबंधित करने में सहायक होती हैं।​
  • सर्जिकल उपचार: बड़ी, लक्षणकारी, या कैंसर की संभावना वाली गांठों को शल्य चिकित्सा द्वारा हटाया जाता है। दो मुख्य प्रकार की सर्जरी हैं:​

 

  • लैप्रोस्कोपी: यह न्यूनतम आक्रामक प्रक्रिया है जिसमें पेट में छोटे चीरे लगाकर गांठ निकाली जाती है। रिकवरी जल्दी होती है और मरीज आमतौर पर 5 दिनों में सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू कर सकते हैं। लगभग 95% ओवेरियन सिस्ट निकालने के लिए लैप्रोस्कोपी का उपयोग किया जाता है।​
  • लैपरोटोमी: यह पारंपरिक ओपन सर्जरी है जिसमें बड़ा चीरा लगाया जाता है। इसका उपयोग बहुत बड़ी गांठों या कैंसर की संभावना होने पर किया जाता है। रिकवरी में अधिक समय लगता है।

रसौली का घरेलू इलाज

आयुर्वेद में गांठ को “ग्रंथि” या “अर्बुद” कहा जाता है और इसे कफ दोष के असंतुलन से जोड़ा जाता है। कई घरेलू और आयुर्वेदिक उपचार लक्षणों को कम करने और गांठ के आकार को नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं:

 

  • त्रिफला: त्रिफला में एंटीनियोप्लास्टिक गुण होते हैं जो गांठ को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। हर दिन सुबह खाली पेट गुनगुना त्रिफला पानी पीना बहुत असरदार उपाय है। इसे पाउडर या काढ़े के रूप में लिया जा सकता है। एक अध्ययन में त्रिफला काढ़े के साथ प्रोसेस्ड गुग्गुलु का उपयोग करने पर ओवेरियन सिस्ट में सुधार देखा गया। ​
  • आंवला: आंवले में एंटी-फाइब्रोटिक प्रभाव होता है। इसमें मौजूद फेनोलिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण फाइब्रॉइड में फायदेमंद होते हैं। ​
  • हल्दी: हल्दी में करक्यूमिन नामक पॉलीफेनोल होता है जिसमें एंटीप्रोलिफेरेटिव और एंटीफिब्रोटिक गुण होते हैं। आप कच्ची हल्दी खा सकते हैं, हल्दी के कैप्सूल ले सकते हैं, या खाने में मिला सकते हैं। हल्दी पाउडर को पानी में उबालकर पीना भी लाभदायक है।​
  • लहसुन: लहसुन विटामिन सी और बी6 से भरपूर होता है जो हार्मोन को संतुलित करने में सहायक है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण फाइब्रॉइड को ठीक करते हैं और आगे बढ़ने से रोकते हैं। नियमित रूप से लहसुन की कलियों को चबाएं या खाने में शामिल करें।​
  • अदरक: अदरक एंडोक्राइन ग्रंथियों को उत्तेजित करके हार्मोनल संतुलन प्राप्त करने में मदद करता है। ताजा अदरक का सेवन करें या अदरक के कैप्सूल लें। 
  • गिलोय: गिलोय का काढ़ा फाइब्रॉइड के लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकता है। आयुर्वेद में इसे कई बीमारियों के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है। 

 

आहार और जीवनशैली में बदलाव

आहार और जीवनशैली में बदलाव करके रसौली से बचा जा सकता है। निम्नलिखित तालिका के माध्यम से इसको बेहतर तरीके से समझा जा सकता है जिसमें खाद्य समूहों की सम्पूर्ण जानकारी दी गई है:

खाद्य समूहउदाहरणलाभ
उच्च फाइबर खाद्य पदार्थपालक, संतरे, दाल, मटर, पपीता, गाजरएस्ट्रोजन के स्तर को नियंत्रित करते हैं।​
लीन प्रोटीनमछली, टोफू, चिकनहार्मोनल संतुलन और वजन प्रबंधन में मदद करती है।​
ओमेगा-3 फैटी एसिडठंडे पानी की मछली, अखरोट, अलसी के बीजसूजन कम करती हैं और हार्मोन संतुलित करती हैं।​
एंटी-इंफ्लेमेटरी खाद्य पदार्थटमाटर, केल, जैतून का तेल, बादामसूजन कम करते हैं। ​
हरी पत्तेदार सब्जियांपालक, केल, कोलार्ड सागविटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं।​
बेरीजब्लूबेरी, स्ट्रॉबेरी, रास्पबेरीएंटीऑक्सीडेंट और विटामिन प्रदान करते हैं।
साबुत अनाजब्राउन राइस, क्विनोआ, ओट्सफाइबर प्रदान करते हैं और इंसुलिन प्रतिरोध से लड़ते हैं।​

रोकथाम के उपाय

हालांकि गांठ को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ उपाय जोखिम को कम कर सकते हैं:

  • नियमित जांच कराएं।  
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें। 
  • संतुलित आहार लें। 
  • नियमित व्यायाम करें। 
  • तनाव प्रबंधन करें। 
  • डॉक्टर की सलाह से हार्मोनल गर्भनिरोधक का उपयोग विचार करें। 
  • धूम्रपान न करें। 
  • पर्याप्त पानी पिए। 
  • सुरक्षित यौन संबंध बनाएं।

डॉक्टर से कब मिलें

निम्नलिखित स्थितियों में तुरंत चिकित्सा सहायता लें:

  • अचानक तेज पेट दर्द। 
  • बुखार के साथ दर्द। 
  • मतली या उल्टी। 
  • चक्कर आना या बेहोशी। 
  • भारी या असामान्य योनि रक्तस्राव। 
  • गर्भधारण में कठिनाई।
  • पीरियड्स में बदलाव या दर्द जो सामान्य उपायों से ठीक न हो।​

निष्कर्ष

बच्चेदानी में पानी की गांठ एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या है जो प्रजनन आयु की महिलाओं को प्रभावित करती है। अधिकांश मामलों में ये गांठें हानिरहित होती हैं और बिना किसी इलाज के अपने आप ठीक हो जाती हैं। हालांकि, कुछ मामलों में ये दर्द, भारी रक्तस्राव और अन्य जटिलताएं पैदा कर सकती हैं। रसौली क्यों होती है इसके कई कारण हैं जैसे हार्मोनल असंतुलन, आनुवंशिक कारक, मोटापा और जीवनशैली। पानी वाली रसौली के लक्षण में पेट दर्द, भारी पीरियड्स, सूजन और संभोग में दर्द शामिल हैं। बच्चेदानी में पानी की गांठ का इलाज विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है। आयुर्वेद और घरेलू उपचार भी लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकते हैं। रसौली का घरेलू इलाज भी संभव लेकिन परेशानी ज्यादा हो तो डॉक्टर से परामर्श करना आवश्यक है। स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम और तनाव प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हैं। प्रारंभिक निदान और उचित उपचार से जटिलताओं को रोका जा सकता है और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

 

  • बच्चेदानी में पानी की गांठ क्या है?

 

बच्चेदानी में पानी की गांठ एक द्रव से भरी थैली है जो गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा या अंडाशय में विकसित हो सकती है। इसे चिकित्सा भाषा में सिस्ट कहते हैं।

 

  • रसौली क्यों होती है?

 

रसौली होने के कई कारण हैं: हार्मोनल असंतुलन (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन), सामान्य ओव्यूलेशन प्रक्रिया, आनुवंशिक कारक, मोटापा, उम्र और अस्वस्थ जीवनशैली। 

 

  • पानी वाली रसौली के मुख्य लक्षण क्या हैं?

 

मुख्य लक्षणों में पेट के निचले हिस्से में दर्द, अनियमित और भारी मासिक धर्म, पेट में सूजन और भारीपन, बार-बार पेशाब आना, संभोग में दर्द, और कब्ज शामिल हैं।

 

  • क्या आहार से गांठ को नियंत्रित किया जा सकता है?

 

हां, स्वस्थ आहार बहुत महत्वपूर्ण है। उच्च फाइबर खाद्य पदार्थ, लीन प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, और हरी सब्जियां खाएं। लाल मांस, प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट, अत्यधिक शक्कर, कैफीन और अल्कोहल से बचें।

 

  • क्या गांठ को रोका जा सकता है?

 

पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है लेकिन स्वस्थ वजन बनाए रखना, संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, तनाव प्रबंधन, धूम्रपान न करना और नियमित जांच कराना जोखिम को कम कर सकता है।