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Main bhool hi gaya tha ki samanya tareeke se saans lena kaisa hota hai

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“मैं इतना सालों से ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था कि मुझे याद ही नहीं था कि सामान्य तरीके से सांस लेना कैसा होता है।”
“हर रात मुंह से सांस लेते-लेते मुझे इसकी आदत हो गई थी। मुझे नहीं पता था कि इसके बिना जिंदगी कैसी होती है।”
“मैंने नाक बंद रहने को अपनी किस्मत मान लिया था, जब तक पहली बार बिना परेशानी के सांस नहीं ली।”
“मुझे लगा था कि रात में मुंह से सांस लेना और सुबह थककर उठना मेरी जिंदगी का हिस्सा है। असली वजह जानकर मैं हैरान रह गया।”

राहुल मेहरा के लिए ठीक से सांस लेना कभी आसान नहीं रहा था। सालों से उनकी नाक अक्सर बंद रहती थी, रात में सांस लेने में परेशानी होती थी और उन्हें मुंह से सांस लेने की आदत पड़ चुकी थी।

लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि इसके पीछे कोई ऐसी समस्या हो सकती है जिसका इलाज संभव है।
पुणे में रहने वाले 34 वर्षीय राहुल एक IT प्रोफेशनल हैं। उनका ज्यादातर काम लैपटॉप पर बैठकर होता है। दिनभर ऑफिस और रात में घर के कामों के बीच उनकी जिंदगी काफी व्यस्त रहती थी।

कई सालों से उन्हें एक समस्या परेशान कर रही थी।

उनकी नाक अक्सर बंद रहती थी।

कभी एक तरफ से सांस लेने में परेशानी होती, तो कभी दूसरी तरफ से।

शुरुआत में राहुल ने इसे मौसम बदलने, सर्दी-जुकाम या एलर्जी समझकर नजरअंदाज किया।

नाक बंद होती तो वह सामान्य दवाएं या नेजल स्प्रे इस्तेमाल कर लेते।

कुछ समय के लिए राहत मिलती, लेकिन समस्या फिर लौट आती।
लेकिन धीरे-धीरे परेशानी बढ़ने लगी।

रात में उनकी नाक ज्यादा बंद हो जाती थी।

उन्हें सोते समय मुंह से सांस लेनी पड़ती थी और सुबह उठने पर मुंह सूखा हुआ महसूस होता था।

कई बार रात में उनकी नींद भी टूट जाती।

सुबह उठने के बाद भी उन्हें ऐसा लगता जैसे उन्होंने ठीक से आराम नहीं किया।
काम पर भी इसका असर पड़ने लगा।

लंबे समय तक बात करने पर सांस लेने में परेशानी होती। कभी-कभी सीढ़ियां चढ़ने या तेज चलने पर उन्हें ज्यादा जोर लगाकर सांस लेनी पड़ती।

राहुल ने कई बार डॉक्टर से मिलने के बारे में सोचा, लेकिन हर बार उन्होंने इसे टाल दिया।
फिर एक रात उनकी नाक पूरी तरह बंद हो गई।

वह कई घंटों तक ठीक से सो नहीं पाए।

सुबह तक वह बेहद थके हुए थे।

उसी दिन उन्होंने तय किया कि अब वह इस समस्या को नजरअंदाज नहीं करेंगे।

उन्होंने ENT विशेषज्ञ से कंसल्टेशन लिया।

जांच के दौरान डॉक्टर ने उनकी नाक की संरचना की जांच की और कुछ टेस्ट कराने की सलाह दी। जांच के बाद पता चला कि उनकी नाक की अंदरूनी हड्डी यानी सेप्टम टेढ़ी थी, जिसके कारण उन्हें सांस लेने में लगातार परेशानी हो रही थी।
डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि इस स्थिति को डिविएटेड नेजल सेप्टम कहा जाता है और कुछ मरीजों में जब दवाओं से पर्याप्त राहत नहीं मिलती, तो सेप्टोप्लास्टी जैसी सर्जरी से सांस लेने में सुधार किया जा सकता है।

राहुल के लिए सर्जरी का विचार थोड़ा डरावना था।
उन्होंने Pristyn Care में ENT विशेषज्ञ से भी कंसल्टेशन लिया।

कंसल्टेशन के दौरान ने उनकी रिपोर्ट्स और लक्षणों को ध्यान से देखा और उन्हें सेप्टोप्लास्टी की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से समझाया।

डॉक्टर ने यह भी बताया कि सर्जरी का उद्देश्य नाक के अंदर टेढ़े सेप्टम को ठीक करके सांस लेने के रास्ते को बेहतर करना है।
परिवार से चर्चा करने के बाद राहुल ने सर्जरी कराने का फैसला किया।

सर्जरी के दिन वह थोड़े नर्वस थे।
सेप्टोप्लास्टी सफलतापूर्वक पूरी हुई।

सर्जरी के बाद डॉक्टर ने उन्हें रिकवरी के दौरान नाक की देखभाल और दवाओं से जुड़ी जरूरी सलाह दी।

शुरुआती दिनों में राहुल को नाक में कुछ असहजता और बंदपन महसूस हुआ, लेकिन उन्होंने डॉक्टर की सलाह के अनुसार आराम किया और निर्धारित दवाएं लीं।

धीरे-धीरे उनकी स्थिति में सुधार होने लगा।

कुछ समय बाद उन्हें सांस लेने में पहले की तुलना में काफी आसानी महसूस होने लगी।
रात की नींद में भी बदलाव महसूस होने लगा।

अब उन्हें बार-बार नाक बंद होने की वजह से नींद से नहीं उठना पड़ता था।

सुबह उठने पर भी वह पहले की तुलना में ज्यादा तरोताजा महसूस करने लगे।
कुछ समय बाद राहुल अपने सामान्य काम पर लौट आए।

लंबे समय तक काम करने, बातचीत करने और रोजमर्रा की गतिविधियां करने में उन्हें पहले जैसी परेशानी महसूस नहीं होती थी।

सबसे बड़ा बदलाव उनके लिए सांस लेने का अनुभव था।
पीछे मुड़कर देखते हुए राहुल को सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि उन्होंने समस्या को इतने सालों तक सामान्य मान लिया।
अब वह उन लोगों को भी डॉक्टर से सलाह लेने की सलाह देते हैं जिन्हें लंबे समय से नाक बंद रहने, मुंह से सांस लेने, खर्राटे आने या सांस लेने में परेशानी जैसी समस्या रहती है।
आज राहुल जब सुबह उठकर गहरी सांस लेते हैं, तो उन्हें अपने पुराने दिनों की परेशानी याद आती है।

सालों तक उन्होंने सामान्य तरीके से सांस लेने को एक ऐसी चीज समझा था जिसके लिए उन्हें हमेशा संघर्ष करना पड़ेगा।

लेकिन अब वह बिना ज्यादा सोचे सांस ले सकते हैं।

 

Author:

R

Rahul Mehra

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