वैरीकोसेल का इलाज करने के ढेरों उपाय मौजूद हैं, जिसमें ओपन सर्जरी, माइक्रोसर्जरी, लेप्रोस्कोपी और परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन आदि शामिल हैं। वैरीकोसेल के इलाज के दौरान उन खराब नसों को बंद कर दिया जाता है जिसके कारण खून एक ही जगह जमा होने लगता है। परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन द्वारा वैरीकोसेल का इलाज लगभग 90% मामलों में सफल होता है तथा इसके बाद मरीज की रिकवरी भी बहुत तेजी से होती है। हालांकि, यह तकनीक इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिक विशेषज्ञता की मांग करती है और इसमें कुछ संभावित गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं, जिसमें वास्कुलर परफोरेशन, कॉइल माइग्रेशन और थ्रोम्बोसिस ऑफ पैम्पिनिफोर्म शामिल हैं।
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परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन सर्जरी क्या है?
जब टेस्टिकल और स्क्रोटम कि नसों में सूजन आ जाती है तो इस समस्या को मेडिकल की भाषा में वैरीकोसेल कहा जाता है। वैरीकोसेल के कारण मरीज को तेज दर्द होता है तथा वे प्राकृतिक रूप से पिता का सुख प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। आमतौर पर वैरीकोसेल की समस्या 15-35 वर्ष के बीच के पुरुषों में देखने को मिलती है। वैरिकोज वेंस में वॉल्व्स मौजूद होते हैं जिनका काम खून को टेस्टिकल्स और स्क्रोटम से दिल तक ले जाना होता है। लेकिन जब ये वॉल्व्स अच्छी तरह से काम नहीं करते हैं तो खून एक ही जगह पर जमा होने लगता है, जिसके कारण स्क्रोटम में मौजूद टेस्टिकल के आस पास की नसें फूलने लगती हैं। वैरीकोसेल से पीड़ित होने की स्थिति में पुरुष में वीर्य (Semen) बनने की प्रक्रिया लगभग बंद हो जाती है।
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लेकिन खुशी की बात यह है की परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन से वैरीकोसेल का इलाज करने के बाद वीर्य बनने की प्रक्रिया को फिर से शुरू हो जाती है। वैरीकोसेल की समस्या को ठीक करने में परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन एक अहम् भूमिका निभाता है। यह वैरीकोसेल का इलाज बहुत ही प्रभावशाली तरीके से करता है। यह एक दिन की इलाज की प्रक्रिया है जिसमें इलाज खत्म होने एक बाद मरीज को मात्र कुछ घंटों तक ही हॉस्पिटल में रुकने की जरूरत पड़ती है। कुछ घंटों के आराम के बाद मरीज अपने घर जा सकते और एक या दो दिन के बाद अपने दैनिक जीवन के कामों को फिर से शुरू कर सकते हैं।
परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन सर्जरी कैसे किया जाता है?
इलाज की इस प्रक्रिया के दौरान इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट कैथिटर को मरीज के शरीर के अंदर डालने के लिए इमेजिंग की मदद लेते हैं। इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले डॉक्टर मरीज को लोकल एनेस्थीसिया देते हैं, क्योंकि इससे मरीज को इलाज की पूरी प्रक्रिया के दौरान जरा भी दर्द या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। एनेस्थसिया देने के बाद डॉक्टर मरीज के पेट केनिचले हिस्से में पेन्सिल की नोक इतना बिलकुल एक छोटा सा छेद करते हैं, फिर इस छेद के माध्यम से एक पतले से कैथिटर को फेमोटरल वेन के जरिए सीधा टेस्टिकुलर वेन तक ले जाते हैं।
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इसके बाद, डॉक्टर कंट्रास्ट डाई को इंजेक्ट करते हैं ताकि इमेजिंग की मदद से इस बात का पता लगाया जा सके की आखिर समस्या कौन सी जगह पर है और नस को ठीक किस जगह पर ब्लॉक करना है। पता लगाने के बाद डॉक्टर धमनियों के ब्लड फ्लो को ब्लॉक कर देते हैं। ऐसा करने से वैरीकोसेल पर कम दबाव पड़ता है और असक्षम धमनियों के बंद हो जाने के बाद ब्लड फ्लो को दूसरी स्वस्थ नसों से जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन की मदद से टेस्टिकल के आस पास की नसों में ब्लड फ्लो सामान्य हो जाता है और मरीज के वीर्य बनने की प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है।
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लेकिन जब परक्यूटीनियस इम्बोलिजेशन के इस्तेमाल के बाद भी वैरीकोसेल में किसी प्रकार का सकारात्मक बदलाव नहीं आता है तो डॉक्टर सर्जरी करने का सुझाव देते हैं। क्योंकि समय पर सही इलाज नहीं होने पर वैरीकोसेल इनफर्टिलिटी का कारण भी बन सकता है। सर्जरी को वैरीकोसेल का सबसे प्रभावशाली इलाज माना जाता है। सर्जरी के दौरान डॉक्टर मरीज के पेट या जांघ के ऊपरी भाग में एक छोटा सा कट लगाते हैं और फिर अल्ट्रासाउंड और सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट की मदद से वे खराब नसों को बंद करके दूसरी अप्रभावित नसों से जोड़ देते हैं जिससे खून का फ्लो सामान्य रूप से होता रहता है। फिर डॉक्टर कट की जगह पर ड्रेसिंग कर देते हैं। इस प्रक्रिया को वेरिकोसेलेक्टॉमी के नाम से जाना जाता है।
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प्रिस्टीन केयर हॉस्पिटल में लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की मदद से वैरीकोसेल का इलाज किया जाता है। यह वैरीकोसेल का इलाज करने का सबसे मॉडर्न और एडवांस तरीका है। इस सर्जिकल प्रक्रिया के दौरान मरीज को जरा भी दर्द या दूसरी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता है। वैरीकोसेल की लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के दौरान कम से कम ब्लीडिंग होती है तथा मरीज 48 घंटे के अंदर पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं। अगर आप भी वैरीकोसेल का सबसे बेहतरीन इलाज पाना चाहते हैं तो प्रिस्टीन केयर आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है।
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