एनल फिशर क्या है?
एनल फिशर एक गंभीर गुदा रोग है।यह एक अंग्रेजी शब्द है, इसे हिंदी में (Fissure Meaning in Hindi) ‘दरार’ कहा जाता है। फिशर रोग की स्थिति में एनस (गुदा द्वार) के अस्तर पर दरार बन जाता है, इसलिए इसे ‘दरार’ या ‘गुदाचीर’ भी कहते है। संस्कृत में इस बीमारी को अर्श कहा जाता है। लेकिन यह फिशर के नाम से प्रचलित है।
फिशर/दरार/गुदाचीर/अर्श का शाब्दिक अर्थ है – ऐसा रोग जो किसी दुश्मन की तरह हमेशा कष्ट देता रहे। ऐसा इसलिए बोला जाता है क्योंकि इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को असहनीय दर्द होता है। सामान्य रुप में इसे सूखी बवासीर के नाम से भी पहचाना जाता है लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है की यह रोग बवासीर से अलग होता है।
फिशर रोग में गुदा द्वार (एनस) पर होने वाली दरारें बहुत दर्द देती है और गुदा द्वार (एनस) से खून भी निकलता है। कुछ लोग इस लक्षण को बवासीर की बीमारी मान लेते हैं, जबकि बवासीर और फिशर में बहुत बड़ा अंतर होता है। यह सही है कि इसके कुछ लक्षण ठीक बवासीर की तरह ही होते हैं, लेकिन यह बीमारी बवासीर से अलग होती है। इसका पहचान करने के लिए इसके लक्षणों (Symptoms of Fissure) को समझना बेहद जरूरी है।
Table of Contents
एनल फिशर के लक्षण
फिशर रोग से पीड़ित व्यक्ति को टॉयलेट के समय गुदा द्वार (Anus) में बहुत तीव्र दर्द होता है। दर्द ऐसा होता है जैसे शरीर के किसी अंग को काटा जा रहा हो। यह दर्द कुछ सेकेंड से लेकर कई घंटों तक बना रह सकता है। कभी-कभी तो व्यक्ति दर्द से पूरे दिन परेशान रह सकता है। दर्द के कारण बहुत से पीड़ित व्यक्ति शौच जाने से भी डरने लगते हैं।
जब फिशर 1 साल से अधिक पुराना होता है तो गुदा के अंदर या बाहर सूजन होने की संभावना अधिक हो जाती है। इस सूजन को उभार भी कहा जाता है। यह सूजन मस्से की शक्ल में ऐसे लटकता रहता है जैसे बवासीर का मस्सा हो। इसे बादी बवासीर Sentinel Tag or Sentinel Piles के नाम भी जाना जाता है।
फिशर के दौरान कभी-कभी स्टूल पास करते समय खून आता है। निम्नलिखित लक्षणों को देख सकते हैं-
- कभी-कभी गुदा में बहुत जलन होती है। गुदा में होने वाली जलन कई बार शौच जाने के 4 या 5 घंटे के बाद तक बनी रहती है।
- गूदे में खुजली होती है।
- फिशर में मल द्वार (एनस भाग) में अचानक दर्द शुरु हो जाता है।
- फिशर से पीड़ित व्यक्ति के गूदा से मवाद निकलना जो पतले पानी जैसा होता है।
एनल फिशर होने के कारण
जिन कारणों से फिशर होता है, उनमें मूल है पेट में कब्ज होना। जिन लोगों को कब्ज की तकलीफ़ होती है उनका मल कठोर हो जाता है और जब मल गुदा द्वार से निकलता है तब यह चीरा या जख्म बनाता हुआ निकलता है। जिसके कारण फिशर होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। फिशर होने के और भी बहुत से कारण हो सकते हैं।
यह रोग गर्भवती महिलाओं में अधिक होता है। गर्भावस्था में गर्भाशय के प्रेशर की वजह से फिशर होने की संभावना अधिक होती है। गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी के वक्त यदि,पेरनियम और बेहतर सपोर्ट न प्राप्त होने पर Mucosa प्रभावित होता है तो फिशर रोग होने की संभावना अधिक होती है।
- फिशर के कारणों में दवाइयों के साइड इफेक्ट भी शामिल है।
- अधिक फ़ास्ट फूड खाने से भी फिशर होने की संभावना बनी रहती है।
- अधिक मिर्च मसाले और मैदा से बने भोज्य पदार्थ भी फिशर को न्योता दे सकते हैं।
फिशर का घरेलू उपचार — Home Remedies For Fissure in Hindi
अधिकतर लोग गुदा संबंधी कोई भी समस्या को बवासीर समझ लेते हैं, लेकिन समझने वाली बात यह है की गुदा से जुड़ी हर बीमारी बवासीर नहीं होती है। हर समय गुदा से संबंधित किसी भी बीमारी को बवासीर कह देना गलतफहमी पैदा कर सकता है, क्योंकि वह फिशर/दरार/गुदाचीर भी हो सकता है।
कई बार ऐसा होता है कि गुदा द्वार पर बड़ी दरारें बन जाती है और इन दरारों से खून निकलने लगता है। रोगी को बेहिसाब दर्द, जलन और बेचैनी होता है।ऐसी स्थिति में फिशर का घरेलू उपचार (Fissure Home Remedies) अपनाना चाहिए। आइए देखते हैं फिशर रोग के लिए कौन-कौन से घरेलू उपचार का इस्तेमाल करना चाहिए।
एलोवेरा से फिशर में राहत मिलती है

फिशर के घरेलू इलाज fissure home remedies में एलोवेरा का उपयोग करना बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। एलोवेरा के प्राकृतिक तरीके से उगने के कारण इसमें आयुर्वेदिक शक्ति होती है। एलोवेरा में दर्द निवारक तत्व भी मौजूद होते हैं जिससे फिशर के दर्द से राहत मिलता है।
फिशर के लिए एलोवेरा का दो तरीके से उपयोग किया जा सकता है। जिसमें एलोवेरा जेल से बने ज्यूस को पीना और एलोवेरा जेल को फिशर की सतह पर लगाना शामिल है। एलोवेरा जेल से बने जूस को दिन में कम से कम 2 बार पीना चाहिए और एलोवेरा जेल को फिशर वाली जगह पर दिन में कम से कम 4 बार जरुर लगाना चाहिए।
फिशर में जैतून के तेल का इस्तेमाल

जैतून के तेल में वसा भरपूर मात्रा में होता है जिसके कारण इससे चिकनाई प्राप्त होती है। जब फिशर रोगी जैतून के तेल का इस्तेमाल करता है तो उसका मल आसानी से बाहर निकल जाता है। जैतून का तेल इस्तेमाल करने से फिशर में होने वाले दर्द से भी राहत मिलती है।
फिशर में जैतून के तेल का इस्तेमाल करने की विधि:
- एक कटोरी में जैतून का तेल, शहद और मधुमक्खियों के वैक्स को बराबर मात्रा में रखें
- अब इन तीनों के मिश्रण को माइक्रोवेव में या गैस पर तब तक गर्म करें जब तक की तीनों आपस में घुल-मिल न जाएं
- जब तीनों अच्छी तरह से मिल जाएं फिर इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दें
अब इस घोल को फिशर वाली सतह पर दिन में 4-5 बार लगाएं।
फिशर में हल्का गरम पानी से नहाएं

हल्का गरम पानी से नहाने पर फिशर से प्रभावित हिस्से में खून का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे छिले हुए और फटे हुए उत्तकों का बेहतर ढंग से उपचार होता है। गुनगुने पानी से नहाने का दूसरा फायदा यह होता है कि इससे दर्द और खुजली भी कम होती है। पानी गर्म करने के बाद उसमें अपनी सुविधानुसार लौंग का तेल डालकर पानी में अच्छे से मिला लेना चाहिए। गर्म पानी से नहाते समय कोशिश करनी चाहिए कि पानी किसी बड़े बर्तन में हो जिसमें आप आराम से बैठ सकें। पानी में बैठने से फिशर जल्दी ठीक हो जाता है। गर्म पानी से दिन में कम से कम 2 बार नहाना चाहिए।
फिशर में नारियल तेल का इस्तेमाल

फिशर में नारियल तेल बहुत फायदेमंद होता है। नारियल तेल में मीडियम-चेन ट्रिगलिसराइड्स (Medium-chain Triglycerides) भरपूर मात्रा में पाया जाता है जिसके कारण यह त्वचा में आसानी से समाहित हो जाता है। नारियल तेल से चिकनाई मिलती है जो फिशर को ठीक होने में मदद करता है। इस तेल को पूरे शरीर पर दिन में कम से कम एक बार और फिशर से प्रभावित हिस्से पर दिन में कम से कम 4-5 बार लगाना चाहिए।
सेब का सिरका का उपयोग

सेब का सिरका में पेक्टिन होता है। इससे पाचन क्रिया में सुधार होता है। सेब का सिरका कब्ज ठीक करने का बेहद कारगर घरेलू उपाय है। इसका उपयोग करने से मल त्याग बहुत आसानी से होता है।
फिशर में अधिक फाइबर युक्त भोजन का सेवन करें
फिशर ठीक करने के लिए हर रोज मल त्याग जरूरी है। नियमित रूप से फाइबर युक्त भोजन खाने से मल त्याग बेहद आसानी से होता है। अब तब आपने फिशर के लिए घरेलू उपचार के बारे में अच्छी तरह समझ लिया होगा। अगर आप या आपके आपके परिवार में कोई भी फिशर की समस्या से पीड़ित हैं तो इसका घरेलू इलाज करने के साथ साथ जितना जल्दी हो सके डॉक्टर संपर्क करना चाहिए।
एनल फिशर होने की संभावना कब बढ़ जाती है?
- जब कब्ज हो तब फिशर रोग होने के चांस बढ़ जाते हैं।
- कम पानी पीने पर भी फिशर रोग होने की संभावना बहुत अधिक होती है।
- जो लोग अधिकतर समय बैठे रहते हैं और शारीरिक श्रम वाला कार्य नहीं करते उनको यह बीमारी आसानी से हो सकती है।
- ऐसे लोग जिन्हें बाजार का जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, नॉन वेज सहित अधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन खाने का शौक होता है।
- महिलाओं में गर्भधारण के समय फिशर रोग होने की संभावना अधिक होती है। महिलाओं को गर्भावस्था के समय कब्ज़ हो जाता है जिससे फिशर या बवासीर रोग हो सकता है। फिशर रोग सामान्यतः महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है।
और पढ़े:
- बवासीर क्या है और इसका घरेलू उपाय क्या है?
- भगंदर रोग क्या है और ठीक कैसे होता है?
- कब्ज़ के लक्षण, कारण और Kabj ka ilaj
अधिकतर पूछे गए प्रश्न
क्या एनल फिशर की सर्जरी करवानी चाहिए?
कई बार रोग की स्थिति गंभीर नहीं होने पर, कुछ घरेलू नुस्खे का उपयोग करके और कब्ज खत्म करके आप इसे एक सप्ताह में ठीक कर सकते हैं। यदि फिशर की आयु बढ़ रही है और इसके लक्षण कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं तो डॉक्टर से मिलकर उपचार की सलाह लेनी चाहिए। यदि आपको क्रोनिक फिशर है तो सर्जरी करवा लेना ही उचित है।
जी हाँ! हम एनल फिशर की दर्द रहित एवं एडवांस लेजर सर्जरी करते हैं, यदि आप जानना चाहते हैं कि एनल फिशर की लेजर सर्जरी कैसे होती है और ओपन सर्जरी के अपेक्षा यह किस तरह से फायदेमंद है तो इस लेख को पढ़ें।
जी हाँ! आपको गुदा क्षेत्र में मलहम लगाने से पहले उस क्षेत्र को गुनगुने पानी से धो लेना चाहिए।
एनल फिशर का दर्दरहित लेजर उपचार के लिए Pristyn Care में अपॉइंटमेंट बुक करें-
- 10 वर्ष से अधिक अनुभवी सर्जन
- एडवांस और लेटेस्ट उपकरण से दर्द रहित एवं रक्तरहित उपचार
- जीरो EMI पर उपचार
- आधा घंटा में इंश्योरेंस अप्रूवल
- प्राधान्य फॉलो-अप
- इलाज वाले दिन कैब की मुफ्त सुविधा
- रहने और खाने की निःशुल्क व्यवस्था
- आर्थिक मदद के लिए डायग्नोसिस में 30 प्रतिशत की छूट
डिस्क्लेमर: यह ब्लॉग सामान्य जानकारी के लिए लिखा गया है| अगर आप किसी बीमारी से ग्रसित हैं तो कृपया डॉक्टर से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें|