प्रेगनेंसी नौ महीने की एक खूबसूरत प्रक्रिया है जिसके दौरान आप एक नए जीवन को इस दुनिया में लाती हैं। इस नौ महीने के दौरान आप खुद में मानसिक और शारीरिक तौर पर ढेरों बदलाव अनुभव करती हैं। कभी आपको इससे खुशी मिलती है तो कभी आपको उदासीनता और चिड़चिड़ापन भी होता है। लेकिन जैसे ही आपकी प्रेगनेंसी का आखिरी समय आता है, जैसे ही अपने गर्भ में पल रहे शिशु को जन्म देने का समय आता है, सभी बुरी भावनाएं दूर हो जाती हैं तथा आप चारों तरफ से खुशियों और पॉजिटिविटी से घिर जाती हैं।
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आप अपने शिशु के आने की खुशी में ढेरों तैयारियों में जुड़ जाती हैं। आप अपने शिशु के जन्म दिन का प्लान बनाती हैं, बेहतर से बेहतर हॉस्पिटल और डॉक्टर का चुनाव करती हैं। इसी दौरान आप नार्मल और सिजेरियन डिलीवरी का चयन भी करती हैं। हालांकि, यह पूरी तरह से आपकी सेहत और आपकी प्रेगनेंसी के स्वास्थ्य तथा इससे जुड़ी दूसरी आवश्यक चीजों पर निर्भर करता है की आपको नार्मल डिलीवरी होगी या सिजेरियन। सिजेरियन को सी-सेक्शन भी कहा जाता है।
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सालों से इस बात पर बहस हो रही है कि नार्मल डिलीवरी ज्यादा बेहतर है या सिजेरियन डिलीवरी। कहीं न कहीं इस बहस ने लाखों महिलाओं को कन्फ्यूजन और परेशानी में डाल दिया है कि आखिर डिलीवरी के इन दोनों तरीकों में से बेहतर तरीका कौन सा है। शोध से यह बात सामने आई है कि ज्यादातर महिलाओं का यह मानना है कि सिजेरियन द्वारा डिलीवरी का कभी भी चुनाव नहीं करना चाहिए, यह हमारे लिए लास्ट ऑप्शन के तौर पर होना चाहिए। लेकिन वही कुछ महिलाएं हैं जो सिजेरियन द्वारा डिलीवरी को प्राथमिकता देती हैं और कहती हैं कि यह हमारे लिए आकर्षक विकल्प होना चाहिए।
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डिलीवरी के इन दोनों माध्यमों में बेहतर क्या है, इस बात का फैसला करने के लिए महिलाओं के पास सबसे पहले विश्वसनीय सूचना का होना आवश्यक है ताकि उसके आधार पर वे एक सही और सूचित निर्णय ले सकें। प्रिस्टीन केयर के इस खास ब्लॉग में आज हम आपको नार्मल और सिजेरियन डिलीवरी से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बातों के बारे में विस्तार से बताने वाले हैं। इसे पढ़ने के बाद आपको यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जाएगी कि इन दोनों के क्या क्या फायदे और नुकसान हैं तथा इनका मां और शिशु पर क्या असर पड़ता है।
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मां के लिए नार्मल डिलीवरी के फायदे और नुकसान
नार्मल डिलीवरी कि प्रक्रिया थोड़ी लेंदी यानी जटिल होती है। इसमें मां को बहुत मेहनत करनी पड़ती है जिसके कारण वह शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती है। लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस प्रक्रिया के बाद मां को ज्यादा देर तक हॉस्पिटल में ठहरना नहीं पड़ता है तथा उनकी रिकवरी भी सिजेरियन कि तुलना में बहुत ही जल्दी हो जाती है। आमतौर पर नार्मल डिलीवरी के बाद मां को 24-48 घंटों के लिए हॉस्पिटल में रखा जाता है फिर उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाता है।
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अधिकतर महिलाएं सिजेरियन कि जगह नार्मल डिलीवरी का चुनाव करती हैं क्योंकि वे अनेस्थिसिया के प्रति अपनी प्रतिक्रिया, ज्यादा ब्लीडिंग, टांके, जख्म, दाग, इंफेक्शन और लंबे समय तक दर्द से बचना चाहती हैं। नार्मल डिलीवरी उन्हें यह सब करने कि आजादी देता है। इसलिए वे डिलीवरी के तुरंत बाद लगभग पूरी तरह से ठीक हो जाती हैं तथा अपने शिशु को दूध पिलाना भी शुरू कर देती हैं जो की शिशु के साथ साथ मां के लिए भी आवश्यक होता है।
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साथ ही, कहीं न कहीं नार्मल डिलीवरी कि अपनी सीमाएं भी हैं। कुछ मामलों में डिलीवरी के समय योनि के आस पास के टिशूज पर प्रेशर पड़ता है जिसकी वजह से वे कमजोर होकर अधिक फैल जाते हैं जिसके कारण उन्हें टांके कि जरूरत भी पड़ती है। टिशूज ढीले होने कि वजह से पेल्विक मांसपेशियों में चोट आ जाती है तथा ये कमजोर हो जाते हैं। पेल्विक मसल्स कमजोर होने के कारण मां यूरिन और बोवेल मूवमेंट को कंट्रोल नहीं कर पाती है जिसकी वजह से उन्हें कभी कभी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ जाता है।
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अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जिस महिला की नार्मल डिलीवरी होती हैं उन्हें यूरिनरी इंकॉन्टीनेंस (Urinary Incontinence) होने का खतरा अधिक होता है तथा खांसते या छींकते समय उनका यूरिन लीकेज भी हो जाता है। नार्मल डिलीवरी के कुछ समय के बाद महिला अपनी एनस और योनि के बीच में हल्का और सुस्त दर्द भी महसूस कर सकती है जिसे पेरिनुवम (perineum) कहा जाता है।
बच्चे के लिए नार्मल डिलीवरी के फायदे और नुकसान
सिजेरियन डिलीवरी कि तुलना में नार्मल डिलीवरी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि शिशु को जन्म देने के बाद मां कम से कम समय में रिकवर हो जाती है। जिसकी वजह से कुछ ही समय के बाद वे अपने बच्चे के साथ होती हैं तथा अपने बच्चे को ब्रेस्फीडिंग भी शुरू कर सकती हैं। प्राकृतिक रूप से जन्म लेने के दौरान, मसल्स मूवमेंट बच्चे के फेफड़ों में मौजूद तरल पदार्थ को निचोड़ देते हैं जो बच्चे के लिए फायदेमंद होता है। नार्मल डिलीवरी के दौरान लंबे समय तक प्रसव पीड़ा (Labour Pain) होने पर बच्चे को चोट लगने और नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है और उसके सिर पर चोट लगने तथा कॉलरबोन टूटने कि संभावना होती है।
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मां के लिए सिजेरियन डिलीवरी के फायदे और नुकसान
जो महिला नार्मल डिलीवरी के लिए फिट होती हैं वे सिजेरियन डिलीवरी के सभी फायदों का लाभ नहीं उठा सकती हैं। लेकिन जिस महिला को पहले से ही पता है कि उन्हें सी-सेक्शन कि आवश्यकता पड़ेगी, वे सभी चीजों को पहले से तैयार एवं सुव्यवस्थित करके अपनी सिजेरियन डिलीवरी कि पूरी प्रक्रिया को काफी हद तक आरामदायक और सुविधाजनक बना सकती हैं तथा इसके सभी फायदों का लाभ भी उठा सकती हैं।
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लेकिन सिजेरियन डिलीवरी की भी अपनी सीमाएं हैं। सिजेरियन डिलीवरी की प्रक्रिया ख़त्म होने के बाद कम से कम मां को 2-3 दिनों तक हॉस्पिटल में रूकना पड़ता है। क्योंकि यह शारीरिक समस्याएं जैसे की दर्द, इंफेक्शन और चीरा वाली जगह पर सूजन तथा बेचैनी की संभावना को बढ़ाता है। नार्मल डिलीवरी की तुलना में सिजेरियन डिलीवरी के बाद रिकवरी में काफी लंबा समय लगता है जिसकी वजह से पेट में तेज दर्द और बेचैनी की शिकायत हो सकती है। अधिकतर मामलों में सर्जरी के दाग को पूरी तरह से ख़त्म होने में लगभग दो महीने का समय लगता है क्योंकि यह एक सर्जिकल प्रक्रिया है।
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सिजेरियन डिलीवरी के साथ ढेरों जोखिम भी आते हैं जिसमें ब्लड लॉस और कमजोरी होना शामिल है। अध्ययन ने इस बात की पुष्टि कि है की जो महिलाएं सिजेरियन के जरिए अपने शिशु को जन्म देती हैं वे शुरुआत में अपने बच्चे को ब्रेस्फीड नहीं करा सकती हैं। क्योंकि ऐसा करने के लिए वे शारीरिक रूप से तैयार नहीं होती हैं। इसके अलावा, जिन महिलाओं कि सिजेरियन द्वारा डिलीवरी होती है उन्हें भविष्य में गर्भधारण करने में समस्याएं और जटिलताएं पैदा होती हैं।
बच्चे के लिए सिजेरियन डिलीवरी के फायदे और नुकसान
आमतौर पर यह माना जाता है कि जिस बच्चे का जन्म सिजेरियन प्रक्रिया के जरिए होता है। उसे जन्म के समय सांस लेने में काफी परेशानी होती है और आगे जाकर उसे अस्थमा होने का खतरा भी अधिक रहता है। सिजेरियन डिलीवरी के दौरान मृतजन्म (Stillbirth) कि अधिक संभावना होती है, साथ ही सर्जरी के दौरान बच्चे को कट/चीरा लगने का खतरा भी होता है। इस बात कि पुष्टि नहीं हुई है लेकिन यह भी कहा जाता है कि सी-सेक्शन और मोटे बच्चे (Obese Child) के बीच कुछ कनेक्शन होता है। इसके पीछे कि एक धारणा यह है कि जो महिला डाईबेटिक या मोटी होती हैं उन्हें सिजेरियन डिलीवरी कि संभावना अधिक होती है।
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निष्कर्ष
जिन महिलाओं को मेडिकल कंडीशन होती है उनके लिए यह बेहतर है कि वे पहले ही सिजेरियन कि तैयारी कर लें ताकि शिशु के जन्म के दौरान उन्हें किसी तरह कि परेशानी या समस्या न हो। हालांकि, यह भी सच है कि प्लानिंग इस बात कि गारंटी नहीं देती है कि डिलीवरी के दौरान जोखिम नहीं होंगे। क्योंकि जिस सिजेरियन कि तैयारी बहुत अच्छे से कि जाती है वह भी गलत हो सकती है। खैर, रिजल्ट चाहे जो भी आपको अपनी तरफ से डिलीवरी की पूरी तैयारी करनी चाहिए। जहां तक बात नार्मल या सिजेरियन की है तो डॉक्टर आपकी स्थिति को देखने के बाद डिलीवरी के मेथड का फैसला करते हैं।
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डिस्क्लेमर: यह ब्लॉग सामान्य जानकारी के लिए लिखा गया है| अगर आप किसी बीमारी से ग्रसित हैं तो कृपया डॉक्टर से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें|