sinusitis treatment

अक्सर मौसम में बदलाव होने पर हमें सर्दी-जुकाम होता है। यह समस्या आम मानी जाती है जो कुछ दिनों में ठीक भी हो जाती है लेकिन सर्दी और जुकाम की आम बीमारी कभी-कभी साइनोसाइटिस (Sinusitis) का रूप ले लेती है।

रमेश सामान्य सर्दी और खांसी की समस्या से जूझ रहे थे। रमेश बताते हैं, “लगभग दो सप्ताह हो गए थे, मेरी सर्दी और खांसी ठीक ही नहीं हो रही थी। इसके साथ मेरे पूरे सिर में दर्द बना रहता था| मैं परेशान हो गया और तुरंत ही किसी अच्छे ENT डॉक्टर से सम्पर्क करने का निर्णय लिया| मेरी मुलाकात Pristyn Care के वरिष्ठ डॉक्टर सुशील से बात हुई| जब डॉक्टर को मैंने अपने सभी लक्षण बताए तो डॉक्टर ने Sinusitis के जांच की सलाह दी।”

रमेश ने डॉक्टर से साइनोसाइटिस से जुड़े कई सवाल किये| आइए जानते हैं डॉक्टर ने रमेश को क्या बताया?

 

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साइनोसाइटिस क्या है? (what is sinusitis?)

 रमेश के इस प्रश्न को सुनकर डॉक्टर उत्तर देते हैं  “साइनस हमारे शरीर में मौजूद एक छोटे आकार की कैविटी (Cavity) है। यह आंखों के बीच, माथे, गाल और नाक में पाया जाता है।”

  • आंखों के बीच एथमोइड (ethmoid sinus) साइनस होता है। 
  • दिमाग के पिछले हिस्से में स्फेनॉइड साइनस (sphenoid sinus) होता है। यह दिमाग के बीच में होता है और दोनों किनारों से सटा रहता है।
  • चेहरे की हड्डी में मैक्सलेरी साइनस (maxillary sinus) मौजूद होता है।
  • माथे में फ्रंटल साइनस (frontal sinus)। 

 

जब साइनस में बैक्टीरियल (Bacterial), वायरल (Viral) या फंगल इन्फेक्शन (Fungal infection) होता है तब इनमें सूजन होती है, ये साइनोसाइटिस कहलाता है। साइनोसाइटिस होने पर सिर दर्द, माथे में दर्द, चेहरे में दर्द, नाक बहना, नाक बंद जैसी कई समस्याएं होती हैं। दर्द कैसा होगा और किस जगह होगा यह साइनोसाइटिस के प्रकार पर निर्भर करता है। कई बार यह विराट रूप ले लेता है तब तुरंत ही डॉक्टर से इलाज करवाने की जरूरत होती है।

साइनोसाइटिस के प्रकार (Types of sinusitis in Hindi)

साइनोसाइटिस मुख्य रूप से चार प्रकार के हो सकते हैं-

इंटेंस (तीव्र) साइनोसाइटिस ( Acute sinus infection)

जब साइनोसाइटिस की समस्या तीन सप्ताह से अधिक की हो जाती है तो उसे एक्यूट साइनोसाइटिस कहते हैं। अगर एक्यूट साइनोसाइटिस को हुए आठ हफ्ते या इससे अधिक समय हो गया है तो इसे क्रोनिक साइनोसाइटिस (Chronic Sinusitis ) कहते हैं। सामान्य तौर पर, एक्यूट साइनोसाइटिस का इंफेक्शन (Infection) तीस दिन के अंदर ही खत्म हो जाता है।

 

लेस इंटेंस (कम तीव्र) साइनोसाइटिस (sub acute sinus infection)

आमतौर पर इसका असर एक महीने से अधिक समय तक रहता है। कम तीव्र साइनोसाइटिस का  संक्रमण एक माह से लेकर तीन माह तक हो सकता है। संक्रमण तीन माह से अधिक नहीं होता है। अगर संक्रमण तीन माह से अधिक होता है तो इसे क्रोनिक (Chronic) संक्रमण माना जाता है।

 

क्रोनिक साइनोसाइटिस (chronic sinus infection)

क्रोनिक साइनस इंफेक्शन बहुत दिनों तक रहता है। इसकी अवधि यानि समय  तीन माह से अधिक होती है। क्रोनिक साइनोसाइटिस को दो भागों में बांटा गया है-

  • एलर्जिक फंगल साइनसाइटिस (allergic fungal sinus infection)
  • नाक में छोटे पॉलीप्स (polyps) के साथ साइनसाइटिस होना। 

 

रीकरंट साइनोसाइटिस (recurrent sinusitis)

अगर किसी व्यक्ति को बार-बार साइनस इंफेक्शन होता है तो इसे रीकरंट साइनोसाइटिस कहते हैं। यह इंफेक्शन एक साल में कई बार हो सकता है। एक्यूट साइनस इंफेक्शन को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है। एक्यूट साइनोसाइटिस (acute sinusitis) का इलाज न करवाने से कम तीव्र (sub acute)  साइनस इंफेक्शन होता है। फिर भी इलाज करवाने में देरी करते हैं तो क्रोनिक साइनोसाइटिस हो जाता है। 

अधिकतर, साइनस इन्फेक्शन के मामले वायरस की वजह से देखे जाते हैं। बैक्टीरियल इन्फेक्शन और फंगल इन्फेक्शन से भी साइनोसाइटिस की समस्या होती है लेकिन वायरल इन्फेक्शन के मुकाबले कम ही होती है। 

असंक्रामक साइनोसाइटिस ( non infectious sinusitis)

यह एलर्जी (Allergy), खुजली (Itching) और जलन की वजह से होते हैं। इनके लक्षण संक्रामक साइनोसाइटिस से मिलते-जुलते हैं। 

 

साइनोसाइटिस के लक्षण (Symptoms of sinusitis in Hindi)

साइनस इंफेक्शन में निम्लिखित लक्षण नजर आते हैं-

  • नाक जाम हो जाती है। कई बार बलगम नाक से फिसल कर गले में आ जाता है। खराश के माध्यम से हम गले में मौजूद बलगम को निकालते हैं। इसे पोस्टनेजल ड्रिप (postnasal drip)  भी कहते हैं। 
  • नाक बंद हो जाता है, इससे सांस लेने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस दौरान हम मुंह से सांस लेने को मजबूर हो जाते हैं।
  • सूंघने की क्षमता कम हो जाती है। स्वाद का भी पता नहीं चलता।
  • आंख और गर्दन में दर्द। गाल, आंख, और माथे में सूजन हो सकता है। सिर में भारीपन महसूस होता है।
  • भूख कम लगती है या भोजन करने का मन नहीं होता है।

 

साइनोसाइटिस के कुछ और भी लक्षण हैं जो कम देखने को मिलते हैं:

  • रात में सोने के बाद या शाम के बाद खांसी अधिक होने लगती है।
  • जी मिचलाना, उलटी भी हो सकती है। 
  • थकान, शरीर का वजनी लगना, तनाव और चिड़चिड़ापन। 
  • दांत या जबड़ों में दर्द।
  • गले में खराश होना। यह सामान्य से अधिक बार होता है।
  • सांस की बदबू। कुछ खाने या पीने के तुरंत बाद बदबू कम हो जाती है और कुछ समय बाद वापस आ जाती है। 
  • कान में तेज दर्द। 

 

लक्षणों को देखकर साइनोसाइटिस का पता लगाना आपके लिए मुश्किल हो सकता है। एक्यूट और क्रोनिक साइनोसाइटिस में एक समान लक्षण नजर आते हैं। आपको एक्यूट साइनस इंफेक्शन हुआ है या क्रोनिक, इसका पता साइनस इंफेक्शन का टाइम  देखकर करें।

एक्यूट साइनोसाइटिस में जुकाम और बुखार भी हो सकता है। लेकिन क्रोनिक साइनोसाइटिस में हल्की बुखार हो सकती है, इसमें जुकाम की समस्या नहीं होती है। क्रोनिक साइनोसाइटिस का मुख्य लक्षण थकान और कमजोरी है। 

 

डॉक्टर को कब दिखाएं (When to see a doctor)

  • एक्यूट साइनस इंफेक्शन का इलाज हो जाने के बाद यह दोबारा होता है तो डॉक्टर को दिखाएं। बार-बार एक्यूट साइनसाइटिस होने से क्रोनिक साइनसाइटिस हो सकता है।
  • एक हफ्ते से अधिक साइनस इंफेक्शन के लक्षण नजर आने पर।
  • तेज बुखार आती है तो इसे नजरंदाज न करें। 
  • गले की मांसपेशियों में अकड़न।
  • आंखों में सूजन। आंखों के आस-पास की स्किन लाल हो जाती है। आंखें भी लाल हो जाती हैं तो डॉक्टर को दिखाएं।
  • पेनकिलर लेने के बावजूद सिर का दर्द कम नहीं होता। सिर के एक हिस्से में हो रहा दर्द पूरे सिर में फैल जाता है।

 

साइनोसाइटिस के कारण (Causes of sinusitis in Hindi)

साइनोसाइटिस की शुरुआत साइनस के कारण या सर्दी जुकाम से होती है। इसमें नाक में मौजूद तरल पदार्थ संक्रमित हो जाते हैं। साइनोसाइटिस के निम्न कारण हो सकते हैं-

वायरल कारण  (Viral causes)

ज्यादातर साइनोसाइटिस के मामले वायरस के कारण होते हैं। वायरल साइनोसाइटिस होने की संभावना बुजुर्गों में ज्यादा होती है।

 

फंगस (Fungus)

जब हवा में शामिल फंगस साइनस के संपर्क में आता है तो एलर्जी की समस्या होती है। साइनस में फंगल इन्फेक्शन भी साइनसाइटिस का कारण बन सकता है।  

पॉल्युशन (Pollution)

बलगम में प्रदूषण के कण मिल जाते हैं। प्रदूषण में मौजूद खतरनाक केमिकल हमारे प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचाते  हैं। इससे बलगम बढ़ता है और साइनोसाइटिस का खतरा भी बढ़ जाता है। 

 

बैक्टीरिया (Bacteria)

बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी साइनोसाइटिस हो सकता है।

 

सिस्टिक फाइब्रोसिस (Cystic Fibrosis)

‘सिस्टिक फाइब्रोसिस’ बलगम, डाइजेस्टिव एंजाइम (Digestive Enzyme) और पसीना बनाने वाली कोशिकाओं को प्रभावित करता है। इससे साइनोसाइटिस होने की संभावना बढ़ जाती है।

 

एसिड भाटा रोग (gastroesophageal reflux disease)

यह पाचन से संबंधित एक समस्या है जिसमें ‘पित्त या पेट की एसिड’ पेट में जलन होती है। पेट में तेज जलन महसूस होती है और एसिडिटी हो सकती है। इसे गर्ड (गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) भी कहा जाता है। एसिड का प्रभाव पेट के ऊपर तक आ जाता है जिससे सीने के निचले हिस्से में भी जलन होती है। एसिडिटी फ्लक्स  रोग होने पर साइनस इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

 

एचआईवी (HIV) 

एचआईवी से संक्रमित होने के बाद शरीर की इम्यूनिटी खत्म हो जाती है। इससे साइनस इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। 

 

 इन स्थितियों में साइनोसाइटिस होने का खतरा ज्यादा रहता है-

  • जिस नली से हम सांस लेते हैं उसके संक्रमित हो जाने पर साइनोसाइटिस का खतरा बढ़ जाता है।
  • अगर नाक में रोगाणु पैदा होते हैं या नाक में सूजन है तो साइनोसाइटिस होने का खतरा अधिक है।
  • अस्थमा के रोगियों  में क्रोनिक साइनस इंफेक्शन (Chronic Sinus infection) का खतरा अधिक रहता है।
  • धूल, धुआं, जानवर के बाल आदि चीजों से एलर्जी है तो इनके आस-पास न जाएं। अगर एलर्जी होने के बावजूद इन चीजों से संपर्क बनाते हैं तो साइनस इंफेक्शन हो सकता है।
  • सेप्टम (Septum) टेढ़ी होने पर या इसमें चोट लग जाने पर साइनोसाइटिस का खतरा बढ़ जाता है। सेप्टम एक हड्डी है जो नाक को दो हिस्सों में विभाजित करती है। यह बहुत संवेदनशील होती है। किसी कारण से हड्डी दाएं या बाएं झुक जाती है तो साइनस इंफेक्शन होने का खतरा बना रहता है।
  • दांतों में कीड़े लगे हैं या दांत संक्रमित हैं तो साइनस इंफेक्शन हो सकता है।
  • धूम्रपान करने से भी साइनोसाइटिस हो सकता है। एलर्जी होने पर धूम्रपान बिल्कुल न करें।
  • साइनस इंफेक्शन के वायरस कहीं भी फैले हो सकते हैं। ये शरीर के संपर्क में आसानी से आ जाते हैं। जिन लोगों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती हैं, उन्हें यह आसानी से नुकसान पहुंचा सकते हैं। 
  • अधिक देर तक पानी में भीगने से सर्दी-जुकाम हो सकता है। साइनस इंफेक्शन की शुरुआत सर्दी-जुकाम से ही होती है। 

 

साइनस इंफेक्शन (साइनोसाइटिस) की जांच  (Diagnosis of Sinus infection (Sinusitis) in Hindi)

साइनस इंफेक्शन की जांच कई तरह से हो सकती है। लक्षणों के आधार पर या मशीनों से शरीर की जांच करवाकर हम साइनस इंफेक्शन का पता लगा सकते हैं। 

साइनस इंफेक्शन की जांच के लिए एक्स-रे करने के लिए कहा जा सकता है। लेकिन कभी-कभी सिर्फ एक्स-रे के जरिए बीमारी का सही पता नहीं चल  पाता है। ऐसा होने पर एम.आर.आई (M.R.I) या सीटी स्कैन करवाना पड़ सकता है।

इस तरह के टेस्ट करवाने के बाद साइनस इंफेक्शन का पूरा पता लग जाता है। लेकिन यह test बहुत महंगे होते हैं और छोटे शहरों में इनकी सुविधा भी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में साइनोसाइटिस का इलाज केवल शुरुआती निष्कर्ष को देखकर किया जाता है। इसके Diagnosis कुछ इस प्रकार हैं

  • नाक से बलगम बहने पर और नाक में सूजन होने पर। इसके साथ नाक लाल हो जाता है।
  • नाक से पस निकलने की स्थिति को देखकर। अगर नाक से पस निकलता है तो साइनस का पता करने के लिए यह सबसे अच्छा लक्षण है। 
  • आंख और गाल में सूजन।
  • माथा और नाक छूने से दर्द होता है।
  • खाते समय जबड़े में दर्द।

 

किस प्रकार का साइनोसाइटिस हुआ है, संक्रमित या असंक्रमित? इसका पता लगाने के लिए बलगम की जांच की  की जा सकती है।

इलाज के बाद भी बीमारी बढ़ जाने पर सीटी स्कैन और एम.आर.आई के जरिए जांच करना जरूरी हो जाता है।

जब रमेश ने डॉक्टर सुशील को अपने सभी लक्षण बताए तो डॉक्टर ने तुरंत ही रमेश की जांच की और बताया, “आपको इंटेंस (तीव्र) साइनसाइटिस की समस्या है”।

 

गर्भवती महिलाओं में साइनस इंफेक्शन 

अगर गर्भवती महिलाओं में साइनस इंफेक्शन होता है तो उन्हें इलाज करवाने में बिल्कुल भी देरी नहीं करनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं में साइनस की जांच अल्ट्रासाउंड से होती है। अल्ट्रासाउंड परीक्षण सीटी स्कैन (Ct Scan), एंडोस्कोपी (Endoscopy) और राइनोस्कोपी टेस्ट (Rhinoscopy test) की तरह सटीक रिजल्ट नहीं दिखाता है लेकिन इससे साइनोसाइटिस का पता लगाया जा सकता है। 

 

एंडोस्कोपी (Endoscopy)

एंडोस्कोपी की प्रक्रिया में एक उपकरण (Endoscope) को शरीर के अंदर डालते है। इस प्रक्रिया में उपकरण शरीर के किसी खोखले अंग या छिद्र में डाला जाता है। यह टेस्ट आसान होता है लेकिन कभी-कभी  रोगी को बेहोशी की दवा दे दी जाती है ताकि उसे किसी प्रकार का दर्द न हो। 

 

बायोप्सी (Biopsy)

बॉयोप्सी में आपके शरीर से टिश्यू (Tissue) का सैंपल (sample) निकाला जाता है। फिर इस सैंपल को लेबोरेटरी (Laboratory) में जांच के लिए भेज देते हैं। सैंपल में वायरस है या बैक्टीरिया इसका पता लगाया जाता है| इससे साइनस इंफेक्शन का पता चलता है। बॉयोप्सी ज्यादातर फंगल इंफेक्शन (fungal infection) के मामले में की जाती है।

 

साइनोसाइटिस का घरेलू इलाज  (Home remedies for sinusitis in Hindi)

कई बार केवल घरेलू इलाज से ही साइनोसाइटिस का इलाज किया जा सकता है।

सेब का सिरका

इंफेक्शन से लड़ने में सेब सिरका मददगार है। एक गिलास गर्म पानी में दो चम्मच सेब का सिरका मिलाएं और पी जाएं। यह उपाय गले और नाक से जुड़े लक्षणों से छुटकारा दिलाएगा।

तिल का तेल

तिल के तेल को हल्का गुनगुना करें और इसकी दो से तीन बूंद नॉस्ट्रिल (Nostril) में डालें। यह इंफेक्शन को दूर करेगा और बंद नाक की समस्या से छुटकारा दिलाएगा।

टमाटर

साइनस इंफेक्शन होने पर सूजन और जलन की समस्या हो सकती है। एक कप टमाटर के रस में तीन चम्मच नींबू का रस मिलाएं। इसे अच्छे से उबालें और ठंडा हो जाने पर पी लें। इसमें मौजूद विटामिन ए सूजन से राहत दिलाएगा। यह बलगम की वजह से हुए नाक में जाम को दूर करता है। 

हल्दी

सूजन और दर्द कम करने के लिए हल्दी का इस्तेमाल करना चाहिए। साइनोसाइटिस का कारण अगर बैक्टीरिया है तो हल्दी उपयोगी हो सकती है। हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। खाने में हल्दी का प्रयोग करें। इसके अलावा चाय उबालते वक्त एक चम्मच हल्दी डाल दें। यह साइनोसाइटिस को खत्म करता है।

अदरक

सूजन और इंफेक्शन खत्म करने के लिए अदरक का इस्तेमाल करें। एक गिलास पानी में अदरक डालकर अच्छे से उबालें। ठंडा हो जाने पर इसमें दो चम्मच शहद मिलाकर पिएं। इस उपाय को हफ्ते भर आजमाने से साइनस इंफेक्शन से छुटकारा मिलता है।

लहसुन

जिन रोगाणु से इंफेक्शन होता है उन रोगाणु को लहसुन आसानी से खत्म देता है। इसमें सूजन विरोधी तत्व पाए जाते हैं जो दर्द कम करने में भी सहायक हैं। रात को सोने से पहले लहसुन की दो कली भूनकर सेवन करें। 

तुलसी

दोनों तरह के संक्रमण (बैक्टीरियल और फंगल इंफेक्शन) होने पर तुलसी फायदेमंद है। एक गिलास पानी में दस तुलसी की पत्तियां डालकर उबालें। पानी ठंडा होने के बाद इसका सेवन करें। दूध के साथ तुलसी की आयुर्वेदिक कैप्सूल (Capsule) भी ले सकते हैं। रोज रात को सोने से पहले एक तुलसी की कैप्सूल गरम दूध के साथ खाएं।

प्याज

नाक में बलगम है तो प्याज का इस्तेमाल करें। साइनस इंफेक्शन के रोगाणु को नष्ट करने में प्याज मदद करता है। प्याज को छोटे-छोटे टुकड़े में काटें और पानी में डालकर उबालें। इससे प्याज के एंटीबैक्टीरियल गुण पानी में घुल जाते हैं। पानी अच्छे से उबल जाने के बाद इसका भाप लें। भाप लेते समय सिर को तौलिये से ढ़क लें।

मेथी

दो चम्मच मेथी एक गिलास पानी में डालकर उबालें। उबलने के बाद इसे ठंडा होने के लिए रख दें और छान लें। साइनस इंफेक्शन से छुटकारा पाने के लिए यह बहुत अच्छा तरल पदार्थ है। कड़वा होने के कारण अगर नहीं पी पा रहें हैं तो इसमें शहद मिला लें।

 

साइनोसाइटिस का इलाज (sinusitis treatment in Hindi)

अंग्रेजी दवाइयों और घरेलू उपचार से साइनोसाइटिस का इलाज कर सकते हैं। सबसे पहले इनके लक्षणों का इलाज किया जाता है जो इस प्रकार से है-

  • गाल या जबड़े के दर्द को दूर करना।
  • सबसे पहले सूजन का इलाज करना।
  • नाक बंद होने की समस्या होती है तो इसका इलाज करें। नाक में दर्द होने पर डॉक्टर से पेनकिलर (painkiller) लें।

 

क्रोनिक साइनस इंफेक्शन (Chronic sinus infection) या इंटेंस (तीव्र) साइनस इंफेक्शन (Intense sinus infection) का इलाज के लिए सबसे पहले एंटीबायोटिक् (Antibiotic) दवाइयों का सेवन करना चाहिए। Sinsuitis के घरेलू उपाय भी आजमा सकते हैं। लेकिन, अगर लक्षण कम नहीं होते हैं और समस्या बढ़ रही है तो विशेष जांच और इलाज करवाना चाहिए। 

 

तीव्र साइनोसाइटिस में एंटीबायोटिक दवाइयां (Antibiotics for intense sinusitis in Hindi)

तीव्र साइनोसाइटिस की समस्या ज्यादा से ज्यादा तीन या चार हफ्ते तक रहती है। साइनोसाइटिस के ज्यादातर मरीज अपनी आदतों में सुधार लाकर खुद को स्वस्थ कर सकते हैं। 

तीव्र साइनोसाइटिस का कारण अगर वायरस है तो एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन बेकार है।

वायरल इंफेक्शन (Viral infection) होने पर एंटीबायोटिक दवाइयां खास असर नहीं दिखाती हैं। ऐसे में आपको डॉक्टर से अन्य उपचार के बारे में जानना चाहिए। वायरल इंफेक्शन (Viral Infection) में जिस दवा का सुझाव डॉक्टर दें उसी का सेवन करें।

 

तीव्र साइनोसाइटिस का एक और मुख्य कारण बैक्टीरिया हो सकता है। बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवा ली जा सकती है। बैक्टीरियल इंफेक्शन को एंटीबायोटिक दवाइयां बहुत जल्द ठीक कर देती हैं। आप कितने समय में पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे यह इन्फेक्शन की तीव्रता और दवा के डोज पर निर्भर करेगा।

 एंटीबायोटिक दवाइयां अपना पूरा असर तब दिखाती हैं जब इनके कोर्स को कंपलीट किया जाए। डॉक्टर ने जितने दिन का डोज दिया है, उतने दिन इनका सेवन करना जरूरी है।

कई बार इलाज के बाद संक्रमण के लक्षण नजर आना बंद हो जाते हैं लेकिन यह पूरी तरह से खत्म नहीं होता है। ऐसे में बार-बार साइनोसाइटिस की समस्या होती है। 

क्रोनिक साइनोसाइटिस का इलाज – Chronic sinusitis treatment in Hindi

इसका संक्रमण तीन महीने से अधिक समय तक रहता है। क्रोनिक साइनस इंफेक्शन का इलाज आसान नहीं होता है। इस साइनस इंफेक्शन में एंटीबायोटिक दवाइयां भी ज्यादा कारगर नहीं होती हैं। 

इस संक्रमण का इलाज लंबे समय तक चलता है। इसमें एंटीबायोटिक थेरेपी (Antibiotic therapy) इस्तेमाल की जाती है। इसका इलाज इतना कठिन होता है कि, कई तरह की एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन एक साथ करना पड़ता है। इलाज के दौरान सूजन होती है तो कॉर्टिकोस्टेरॉइड नेजल स्प्रे (corticosteroid nasal spray) का इस्तेमाल किया जाता है। इस स्प्रे की मदद से ब्रीथिंग (Breathing) नली के सूजन को कम किया जाता है।

क्रोनिक साइनोसाइटिस होने की एक और वजह फंगल (Fungal) या वायरल इन्फेक्शन (Viral infection) है। अगर आपके शरीर का इम्युनिटी पावर (Immunity power) सही कार्य करने में सक्षम नहीं है तो कई सारे संक्रमण एक साथ हो सकते हैं। अगर ऐसे संक्रमण हुए तो एंटीबायोटिक दवाइयां भी बेअसर हो जाती हैं।

फंगल क्रोनिक साइनोसाइटिस (Fungal chronic sinusitis) का इलाज एन्टी-फंगल (Anti-fungal) दवाइयां देकर किया जाता है। इसके अलावा कॉर्टिकोस्टेरॉइड (Corticosteroid) दवाइयां भी दी जा सकती हैं। बीमारी ठीक होने के बजाय बिगड़ती है तो सर्जरी ही एकमात्र उपाय बचता है।

अगर दवाइयों का डोज खत्म हो गया है और लक्षण लगातार परेशान कर रहे हैं तो डॉक्टर सर्जरी का सुझाव देंगे। 

साइनस इंफेक्शन के लिए सर्जरी (Surgery for sinus infection in Hindi)

जब दवाइयों से बात नहीं बनती है तो सर्जरी कराना जरूरी हो जाता है। पहले साइनस इंफेक्शन की सर्जरी दर्द भरी होती थी। साइनोसाइटिस को ठीक करने के लिए एक चीरा लगाया जाता था। सामने की हड्डी और ऊतक को हटा दिया जाता था लेकिन अब सर्जरी नोस्ट्रिल (nostril) से की जाती है। सर्जरी के बाद किसी प्रकार के दाग-धब्बे नहीं रहते हैं। सर्जरी के बाद कुछ ही दिनों में रोगी पूरी तरह से स्वस्थ हो जाता है। सर्जरी के एक दिन बाद रोगी को हॉस्पिटल से फ्री कर दिया जाता है। 3 से 4 दिन के भीतर रोगी पूरी तरह से स्वस्थ हो जाता है।

 

साइनस इंफेक्शन से बचाव (Prevention from sinus infection)

अगर घर में कोई साइनस इंफेक्शन से पीड़ित है तो खुद का बचाव करना बहुत जरूरी हो जाता है। निम्नलिखित तरीकों से आप साइनस इंफेक्शन से बच सकते हैं-

 

  • खाना खाने से पहले हाथों को साबुन से धोएं। शौच के बाद अच्छी तरह से हाथ धोएं। 
  • ऐसे जगहों में न जाएं जहां प्रदूषण उच्च स्तर पर हो। इसके अलावा धूल और धुआं से भी दूरी बनाए रखें।
  • किसी वस्तु से एलर्जी है तो उसके संपर्क में न आएं।
  • संक्रमित व्यक्ति के छींकने य खांसने पर उसके पास न जाएं। बोलते समय उसके मुंह से निकलने वाली हवा के संपर्क में भी न आएं।
  • धूम्रपान बिल्कुल न करें। धूम्रपान से निकलने वाले धुआं के संपर्क में भी न आएं। यह फेफड़ों के लिए बहुत खतरनाक होता है तथा नाक और गले में सूजन पैदा कर सकता है।

रमेश कहते हैं “मैं Pristyn Care और डॉक्टर शुशील का दिल से धन्यवाद करना चाहूंगा| डॉक्टर शुशील ने मेरा ट्रीटमेंट अच्छे से किया, इस बात से मैं बहुत ज्यादा खुश हूं।”

अगर आप भी साइनोसाइटिस के लक्षणों से गुजर रहे हैं तो ‘Pristyn Care’ आपकी मदद कर सकता है|

आखिर साइनोसाइटिस के ट्रीटमेंट के लिए Pristyn Care ही क्यों?

प्रशिक्षित डॉक्टर की टीम- साइनोसाइटिस का इलाज करने के लिए हमारे पास प्रशिक्षित डॉक्टर की टीम है| 

अपने शहर में करा सकते हैं ट्रीटमेंट- हमारे डॉक्टर कई शहरों में मौजूद हैं। इसलिए, आपको साइनसाइटिस के ट्रीटमेंट के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं होगी। इसके साथ मरीज़ के आने जाने का ख़र्चा भी हम ही उठाते है।

फ्री फॉलो अप- हम अपने मरीज़ों को फ्री फॉलो अप (Follow up) की सुविधा भी प्रदान करते हैं। 

इंश्योरेंस की सुविधा– हमारी इंश्योरेंस (Insurance) टीम के जरिये आप साइनोसाइटिस का इलाज इंश्योरेंस क्लैम के साथ करा सकते हैं।

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